छठ पूजा पर्व विधि इतिहास और महत्व : Essay on Chhath Puja in Hindi

छठ पूजा पर्व विधि इतिहास और महत्व : Essay on Chhath Puja in Hindi

छठ पूजा पर्व विधि इतिहास और महत्व : Essay on Chhath Puja in Hindi :इन हिंदी हिंदुओं के सबसे बड़े पर्व दीपावली को पर्वों की माला माना जाता है। पांच दिन तक चलने वाला ये पर्व सिर्फ भैयादूज तक ही सीमित नही है बल्कि यह पर्व छठ  तक चलता है। उत्तर प्रदेश और खासकर बिहार में मनाया जाने वाला ये पर्व बेहद अहम पर्व है जो पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है। छठ केवल एक पर्व ही नहीं है बल्कि महापर्व है जो कुल चार दिन तक चलता है। नहाय-खाय से लेकर उगते हुए भगवान सूर्य को अर्घ्य देने तक चलने वाले इस पर्व का अपना एक ऐतिहासिक महत्व है।

भूमिका  :  छठ पूजाहिंदुओं का एक प्रसिद्ध त्योहार है। यह बिहार , उत्तर प्रदेश व भारत के  कई अन्य हिस्सों में बड़े ही धूमधाम से श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है।

यह पश्चिम बंगाल, झारखंड, उड़ीसा, असम और भी मॉरीशस और नेपाल के कुछ हिस्सों में भी मनाया जाता है।  हिंदू कैलेंडर के अनुसार कार्तिक महीने के छठवें दिन (षष्ठी) चंद्र पखवाड़े (शुक्ल पक्ष) के दिन छठ पूजा होती है।

यह आम तौर पर अक्टूबर-नवंबर के महीने में  मनाया जाता है। त्योहार दिवाली से शुरू होकर नौ दिनों तक चलने वाले हिंदुओं के प्रमुख त्योहारों में लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा का विशेष स्थान है. छठ पूजा उत्तर भारत में बेहद अहम् त्योहार या पर्व माना जाता है।

चार दिनों तक होने वाले इस त्योहार को महापर्व भी कहते हैं। छठ पूजा कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को मनाई जाती है। यह चार दिवसीय महापर्व है जो चौथ से सप्तमी तक मनाया जाता है। इसे कार्तिक छठ पूजा कहा जाता है. इसके अलावा चैत महीने में यह पर्व मनाया जाता है जिसे चैती छठ पूजा कहते हैं।

पष्ठी के दिन माता छठी की पूजा की जाती हैं, जिन्हें धार्मिक मान्यताओं के अनुसार (छठी मैया) कहा जाता है। मान्यताओं के अनुसार छठी मईया और भगवान सूर्य करीबी संबंधी हैं।

इस पर्व के दौरान छठी मइया के अलावा भगवान सूर्य की पूजा-आराधना होती है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति इन दोनों की अर्चना करता है उनकी संतानों की रक्षा छठी माता करती हैं लाभलाभ :  इस पर्व में भगवान सूर्य की उपासना और अर्घ्य देने का नियम है। इतना ही नहीं छठ माँ से शारीरिक बीमारी को  ठीक होने और पुत्र की कामना कर छठी मैया को अपने घर से घाट तक दंड देते हैं।

जबकि दंड देने में रात 2:00  बजे से दंड देना शुरू करते हैं तो सवेरे  घाट तक पहुंँचते हैं और शाम में अर्घ्य देने के लिए फिर 2:00 बजे से दंड देते -देते घाट तक पहुंँचने में सूर्यास्त का लगभग समय हो जाता है और फिर नदी में प्रवेश कर स्नान कर पान सुपारी लेकर भगवान सूर्य का ध्यान में लग जाते हैं। इतना कष्ट होने के बावजूद भी भक्तगण की कमी नहीं है। श्रद्धा विश्वास  के साथ पूजा करने से मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है।

पूजा की तिथि  : इस बार छठ पूजा की तिथि दिनांक- 11.11.2018 को नहाय खाय अर्थात्. कदवा भात, दिनांक- 12.11.2018 को खरना, दिनांक- 13.11.2018 को पहला अर्घ्य अर्थात  पहला पूजा दिनांक- 14.11. 2018 निस्तार अर्थात अंतिम पूजा बड़े ही विश्वास के साथ मनाते हैं।

  1. सूर्य उपासना के पुरानी कथा:

बहुत समय पहले की बात है राजा प्रियवंद और रानी मालिनी की कोई संतान नहीं थी। महर्षि कश्यप के निर्देश पर इस दंपति ने यज्ञ किया जिसके चलते उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। दुर्भाग्य से यह उनका बच्चा मरा हुआ पैदा हुआ। इस घटना से विचलित राजा-रानी प्राण छोड़ने के लिए आतुर होने लगे। उसी समय भगवान ब्रह्मा की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं।

उन्होंने सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं इसी कारण वो षष्ठी कहलातीं हैं। उन्होंने बताया कि उनकी पूजा करने से संतान सुख की प्राप्ति होगी। राजा प्रियंवद और रानी मालती ने देवी षष्ठी की व्रत किया और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई।  कहते हैं ये पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी और तभी से छठ पूजा होती है।

 

इस त्योहार से जुड़ी बहुत -सी प्राचीन कथाएँ हैं जिनमें से कोई रामायण काल की है तो कोई महाभारत काल की। इस पर्व की तैयारी दिवाली के बाद ही बड़े उत्साह से शुरू जाती है। छठ पूजा के पहले दिन  यानि चतुर्थी के दिन महिलाएँ चने की दाल, लोकी की सब्जी ,काअरवा चावल का  भात और रोटी आदि खाती है।

अगले दिन (पंचमी दिन )वह रात को सिर्फ गुड़ की खीर खाती है जिसे खरना कहते हैं। तीसरे दिन यानि कि षष्ठी के दिन वह निर्जला व्रत रखती है और अपनी सामर्थ्य के अनुसार 11, 21 या 51 फलों का प्रसाद बाँस के डालिया में बाँधकर अपने पति या बेटे को दे देती है और नदी की तरफ चल पड़ती है। जाते जाते रास्ते में महिलाएँ छठी माता के गीत गाती हैं।

प्रसाद के रूप में पूरी लड्डू, मिठाई, चावल का  मिला हुआ लड्डू, नारियल, शेव, संतरा, ईख, पनियाला, टाभ, मौसमी, अनार, केला, खीरा, कच्चा हल्दी इत्यादि सुप में भर कर एक डाली में भर कर माथे पर उठाकर खाली पैर घाट पर पहुँचकर पंडित से पूजा करवाकर शाम को कच्चे दूध से डूबते हुए सूर्य को अर्ध्य देती हैं। अगले दिन उदय होते हुए सूर्य को भी कच्चे दूध से अर्ध्य दिया जाता है और फिर वह अपना व्रत तोड़ती है। छठ पूजा के बाद सभी लोग बहुत खुश नजर आते हैं और वहाँ पर दिवाली जैसा दीपों की जगमगाहट  पटाखों की तर -तराहट देखने में सच मायने में दिल को छू जाती है। वो दृश्य बड़े ही मनमोहक होती है।

2. अयोध्या लौटने पर भगवान राम ने किया था राजसूर्य यज्ञ

विजयादशमी के दिन लंकापति रावण के वध के बाद दिवाली के दिन भगवान राम अयोध्या पहुँचे। रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए भगवान राम ने ऋषि-मुनियों की सलाह से राजसूर्य यज्ञ किया। इस यज्ञ के लिए अयोध्या में मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया गया। मुग्दल ऋषि ने मांँ सीते को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया। इसके बाद माँ सीता मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी।

3. जब कर्ण को मिला भगवान सूर्य से वरदान

एक मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। इसकी शुरुआत सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्य की पूजा करके की थी। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे और वो रोज घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बने।

आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही परंपरा प्रचलित है। छठ पर्व के बारे में एक कथा और भी है। इस कथा के मुताबिक जब पांडव अपना सारा राजपाठ जुए में हार गए तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा था।

इस व्रत से उनकी मनोकामना पूरी हुई थी और पांडवों को अपना राजपाठ वापस मिल गया था। लोक परंपरा के मुताबिक सूर्य देव और छठी मईया का संबंध भाई-बहन का है। इसलिए छठ के मौके पर सूर्य की आराधना फलदायी मानी गई।

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