प्रकृति और मानव का अजीब दास्ताँ | Man Vs Nature

प्रकृति और मानव का अजीब दास्ताँ | Man Vs Nature

प्रकृति और मानव में अन्योन्याश्रय संबंध है। प्रकृति पिता है तो मानव पुत्र है। प्रकृति की गोद में सारे जीव पलते हैं। प्रकृति हरपल अपनी जीव पर अपनी निगाह बनाए रखते हैं।

प्रकृति मानव को सबसे उन्नत ज्ञान दिया है और प्रकृति की बागडोर उन्हीं के हाथों दे दिया ताकि मानव अपनी ज्ञान चक्षू से समुचित ढंग से प्रकृति का उपभोग  कर सकेंगे ।

हर जीव को स्वर्ग दिखता है :

प्रकृति हर पल अपनी Nigahen सभी जीवो पर बनाए रखती हैं प्रकृति जब खुश रहता है तो हर जीव को स्वर्ग दिखता है। जब वह आवेशित हो जाते हैं तो प्रलय आ जाती है।

हर तरह का मौसम :

प्रकृति ने हर तरह का मौसम दिया है। अपनी जरूरत के मुताबिक। बारिश का मौसम जब आता है तो यह बारिश का पानी गली सड़क नाला गांव घर कहीं भी गंदगी फैला रहता है, तो उसे हर जगह से उस विषाक्त कचरे को धोकर बाहर निकाल देती है और जगह स्वच्छ हो जाता है।

जैसे आप देखें घर की नारी अपने घर में झाड़ू साफी लगाती हैं। घर की सफाई करने के लिए वही प्रकृति अपनी सभी जीव का फैलाए गए कचरे को एक मां के रूप में सफाई कर बहा ले जाती है,जिससे कि प्राकृतिक छटा स्वस्थ और सुंदर दिखता है।

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इतना ही नहीं हमें जो जल की कमी होती है तो बारिश के रूप में आकर हमें जल भरपूर मात्रा में उपलब्ध करा देती है। बरसात के मौसम में जब मैं चलता हूं तो मुझे कीचर का एहसास होता है,

लेकिन उसके लिए भी इतना जल उपलब्ध करा दिया जाता है जो की साफ सफाई में कोई कठिनाई नहीं होती है उस जल से सारे प्राकृतिक छटाएं तरोताजा और हरी-भरी दिखती है।

प्रकृति का रूप :

साधारण बाढ़ के रूप में हम तक पहुंच कर हमारे खेत को उर्वरक क्षमता बढ़ा देती है और गंदे कचरे को बहा ले जाती है, लेकिन जब मैं प्रकृति का दोहन करता हूं।

उसके साथ छेड़छाड़ करता हूं तो वह प्रलयकारी काल रूप में, भयानक वर्षा के रूप में, कहीं बादल का फट जाने से गांव और शहर  को बहा ले जाना, तो कहीं बिजली की तरतराहट से घर के अंदर भी आदमी को धराशाई कर देना,

कहीं -कहीं भारी बाढ़ से कई गांव और कस्बे नष्ट नाबूद कर देती है, जिसे देख रूह कांप उठता है। इतना ही नहीं उसी समय भूकंप का भी झटका एक प्रलय लेकर खड़ी हो जाती है।

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अब जाएं तो कहां जाएं। वह जब विकराल रूप में आती है तो इतनी सुंदर सजी हुई प्रकृति को अपने आगोश में समेट लेती है जमीन फट जाता है और खुशहाल जीवन उसमें समा जाती है।

प्रकृति की लीला तो अपरम पार है। मनुष्य ज्ञानी जीव होते हुए भी प्रकृति का हर समय छेड़छाड़ करते रहता है। कहीं पहाड़ और पठार को तोड़ना, तो कभी पेड़ काटना, कभी न्यूक्लियर का ज्यादा से ज्यादा परीक्षण करना, कल कारखाने और शौचालय का उत्सर्जित पदार्थ को नदी में प्रवेश करना।

प्रकृति का दोहन:

यह सब तो प्रकृति का दोहन ही तो है, जो प्रकृति इस संसार को इतनी फुर्सत से रचा है और रच कर मानव के हाथ में दे दिया है और उसे ड्राइव करने का ज्ञान भी दे दिया है, लेकिन मानव इतना विछिप्त हो गया है कि वह समझ नहीं पाता है कि हमें उपहार स्वरूप जो प्राकृतिक छटा मिला है, उसे हम किस प्रकार उपभोग करें। उसे किस प्रकार संभाल कर रखें। जैसे आप देखते हैं, नशा जब पीता है तो इंसान को अपने आप को नहीं देख पाता है।

मैं क्या हूं ? मुझे क्या करना है? मेरा उद्देश्य क्या है? सारे जी को भूल जाता है। ठीक उसी प्रकार मनुष्य को ताकत जब हुआ तो उसमें ज्ञान छुप गया। वह ताकत की खोज में ज्ञान को खो देता है जबकि मानव की यही सबसे बड़ी भूल है।

प्रकृति के द्वारा मिला बड़ा मैडल : 

मनुष्य को समझना चाहिए  की जैसे कोई अच्छे कार्य का मेडल मिलता है तो उसे पुस्त दर पुस्त संभाल कर रखा जाता है। उससे भी  बड़ा मैडल तो प्रकृति के द्वारा मिला है, लेकिन उसको संभाल कर नहीं। इसको दोहन करने में लगा है।

प्रकृति में मानव इतना विश घोल दिया :

घर से लेकर  बड़े-बड़े फैक्ट्री तक  वायु प्रदूषण ध्वनि प्रदूषण और जल प्रदूषण में बड़े ही जोर शोर से लगा हुआ है। एक समय था। प्रकृति का हर चीज अमृत के रूप में जाना जाता था, लेकिन वही मानव अथाह ज्ञान को पाकर अपना नुकसान ही करने में जोर शोर से लगा हुआ है।

जिसके कारण आज वही मानव सोचता है कि कहां मैं जा कर स्वस्थ और सुरक्षित रह सकता हूँ। लेकिन उसके दृष्टिकोण में कहीं भी शुरक्षीत हो ऐसा जगह उसे नहीं दिखता।

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प्रकृति में मानव इतना विश घोल दिया है कि उसका शरीर का सेल बहुत हद तक डेड हो चुका है, जिसके कारण असमय  बुढ़ापा भारी से भारी बीमारी और शरीर का ग्रोथ बहुत कम होने लगा है।

हमारे दादा-दादी कहते थे:

हमारे दादा-दादी कहते थे की 1 दिन ऐसा आयगा जो लग्गा से बैंगन तोड़ा जाएगा। वह दिन अब दूर नहीं चुके देखा जाए तो हमारे पूर्वज 7और 8 फिट का होते थे लेकिन आज के दौर में देखा जाए तो 5 से 6 फिट का होता है तो इससे अनुमानित होता है कि कल के डेट में पूर्वज की गाथा सत्य प्रतीत होने  वाला है।

धरोहर को बचाएं : 

हमारे अच्छे दोस्त आइए हम सब मिलकर प्रकृति के द्वारा उपहार स्वरूप प्राप्त की हुई धरोहर को सब मिलकर बचाने का काम करें। ताकि हम और हमारे आने वाले पीढ़ी तक इस स्वर्ग का आनंद ले सके।

यह आर्टिकल प्रकृति और मानव का अजीब दास्ताँ आपको कैसा लगा हमें आप कमेंट के माध्यम से अपना संदेश पहुंचाने का कष्ट करेंगे और अगर अच्छा लगा हो तो अपने दोस्तों तक शेयर कर अवश्य पहुंचाने का कोशिश करेंगे ताकि सारे दोस्त इस मुहिम में शामिल हो सकें।

सरोज देव, खगड़िया (बिहार)

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