गणेश शिव के पुत्र नहीं, शिष्य थे : True Story Of God Ganesha In Hindi

True story of god ganesha : गणेश शिव के पुत्र नहीं, शिष्य थे आधुनिक युग में लेखक ,गायक और कवि सबके-सब गणेश को भगवान शिव का निजि पुत्र कहकर कहानी कविता,गीत,गजल लिखते आ रहे हैं।

माता तोरा पार्वती पिता महदेवा, हो गणनायक देवा।और हमसे भंगिया ना पिसाई हो गणेश के पापा।

इस गाना को सुनने से ऐसा प्रतीत होता है कि भगवाश शिव भाँग-गाँजा भी खाते -पीते थे और गणेश की माँ भोले नाथ से कह रही है- अब हमसे भाँग का पिसाई नहीं होगा, मुझे तंग मत कीजिएगा। नहीं तो मैं अपने नैहर चली जाऊँगी। ऐसे-ऐसे ढेर सारे गाना बनाकर गाया जाता है,

जिसे सुनकर लोग बेहिचक समझ जाते है कि गणेश भगवान शिव का सबसे बडा़ और प्यारे पूत्र थे। लेकिन यह केवल भ्रांतियाँ हैं। सच तो यह है कि गणेश नाम का कोई पुत्र भगवान शिव के घर जन्म लिए ही नहीं थे।

शिव पूराण में ऐसा वर्णन आया कि गणेश मैया पार्वती का पूत्र है। जो बिल्कूल असत्य है। अब आप सत्य क्या है ? वह जाने। भगवान शिव के तीन पत्नियाँ थी। यह बात सब लोग जानते हैं। भगवान शिव के पहली कन्या- आर्य कन्या पार्वती थी। पार्वती जो गौर वर्ण की काफी सुदंर और सभ्य थी ।

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दूसरी अनार्य कन्या- काली। काली जो कृष्ण वर्ण की थी, देखने में काली -कलूठी लेकिन काफी रूप वती थी । तीसरी कन्या – मंगोल कन्या जो पीतवर्ण नाम थी- गंगा देखने में बहुत सुदंर और शुशील थी।इस तरह शिव की तीन रानियाँ थी। इन्हीं तीन पत्नियों में -पावॅती से कार्तिक, काली से भैरव और भैरवी को दो बच्चे और गंगा से कोई संतान नहीं था। वह निःसंतान थी। इस प्रकार शिव के दो लड़के और एक लड़की थी। फिर गणेश शिव का पूत्र कैसे हो गया।

शिव के काल में आर्य, अनार्य, मंगोल अनेक प्रजातियों के लोग निवास करते थे। शिव सवको अनेक छोटे-2 दलों में बाँटकर आध्यात्मिक शिक्षा, और धर्म क्रीडा़ का शिक्षा देते थे। समय -समय पर उन सबौं के बीच प्रतियोगिता भी करवाते थे। प्रतियोगिता में विजयी टीम और पराजित टीम दोनों को प्रेम पूर्वक एक साथ बैठाकर गले से गले मिलवाते थे

और दोनो टीम को कुछ न कुछ उपहार देते थे। ऐसा करने से सब लोगों के साथ-साथ भगवान को भी अपार आनंद मिलता था। सबके बीच आध्यात्मिक प्रेम और अपनत्व की भावना जग जाते थे ।

इस तरह शिव ने पास-पडो़स के सभी वासियों को सैद्धांतिक रुप से प्रशिक्षण में निपुण करा दिया था। उस समय शिव शिष्यों के अनेकोनेक दल समूह थे। सब दल समूह के एक -एक चुने गये

दल नेता होता था। जिसे सब लोग अपना मुखिया या प्रधान,बलवान, शक्तिमान मानते थे। जिसे दलनायक की संज्ञा दिए थे।

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शिव शिष्यों के अनेकोनेक दल समूहों में इसी खेल प्रतियोगिता के तहत चुने गये, हर पहाड़ पर एक -एक व्यक्ति को शक्तिमान या वलबान माना जाता था। उनके प्रत्येक दल में उस एक श्रेष्ठ व्यक्ति को दलनायक की संज्ञा दिए थे। उसी दलनायकों में से एक सर्व श्रेष्ठ बलवान व्यक्ति को शिव ने गणेश या गणनायक का पद दिया था।

क्योकि दलनायक या दलपति तो छोटे-2 दल या टीम के श्रेष्ठ व्यक्ति को कहा जाता था। उसी दल समूहों मे से प्रत्येक दल के एक सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति को दलनायक और उसी दल नायकों में से सर्वश्रेष्ठ महाशक्तिवान व्यक्ति को भगवान शिव ने अपनी इच्छा से गणपति ,गणनायक या गणेश कहा करते थे। भगवान शिव जब काफी प्रशन्न होते थे तो प्यार से बेटा गणेश भी कहा करते थे।

इस प्रकार उसी दिन से आज भी लोग गणेश को शिव का पुत्र के नामसे जानने लगे, कालान्तर में भगवान शिव द्वारा मौखिक रूप से कहे गये ऐसे बेटा को लौगों ने शिव का नीजि पुत्र या बेटा का रूप दे दिया था। उसी दिन से गणेश जी की प्रथम वंदना होती आ रही है। शिव शिष्य लोग गणेश को सर्व श्रेष्ठ गुरू भाई कहने लगे थे।

गणेश शिव का नीजि पुत्र नहीं थे,इसका एक और प्रमाण है , जब भगवान शिव ,पार्वती से विवाह करने जा रहे थे तब शिव ने गणेश को सम्पूर्ण साक्मचहिक बारात दलों के संचालक का भार दिया था। गणेश को ही शिव-विवाह मेंआगे-2 चलने का प्राधिकार मिला था।उसके बाद ही पीछे-2अन्यान्य सभी दलों के साथ बारात समूहों के बीच स्वं भगवान शिव अपने वाहन बसहा पर सवार थे।

क्योकि भगवान शिव अपने शिष्यों में से उस गणेश को ही प्रथम नेतृत्व कर्ता मानते थे, उसमें ही नेतृत्व की क्षमता था। इसलिए उन्हें बडे़ प्रेम से बेटा गणेश कहते थे। ऐसे ही पुत्र थे–गणेश।

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अतः हम कह सकते है कि गणेश शिव का बेटा नहीं बल्कि सर्वशक्तिमान, दलनायकों में अग्रगण्य, सर्व -गुण समपन्न एक श्रेष्ठ शिव शिष्य थे। यही कारण है कि आज भी लोग सबसे पहले गणेश जी की वंदना होती है।

सुधीर यादव, बरेटा,
खगड़िया (बिहार )

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